Sunday, December 14, 2014

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दूरियाँ हमेशा रहीं

दूरियाँ हमेशा रहीं, नजदीकियों के ठिकाने ना रहे
साथ रहा कुछ यों के फ़साने....फ़साने न रहे |

मुद्दतों भटकने के बाद वो आज घर लौटा
माँ के हाथ की रोटी, लोरियों के ज़माने न रहे |

उम्र गुज़ार दी इक मुकम्मल मक़ाम की तलाश में
मक़ाम तो नसीब था,
वो यार पुराने न रहे |

शोर का बाज़ार है,
ये शोर का ज़माना
लता के गीत कहाँ, वो रफ़ी
के तराने न रहे |

माँ का आँचल ओढ़ बच्चे, आसमां से टकराते थे
आसमां टूट कर बरसा उनपे, जिनके सर शामियाने न रहे |

दीवाने लोग थे इश्क को इबादत समझते थे 
इश्क तो आज भी है, बस लोग दीवाने न रहे |



- साकेत



फ़साना - Tale, Fiction
मुकम्मल - Perfect, Complete
मक़ाम - Position
शामियाना - Canopy; A covering (usually of cloth) that
serves as a roof to shelter an area from the weather.


 

Friday, December 12, 2014

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ए मेरी जिंदगी !

सहर सजेगी होली में फिर...
हर शाम दिवाली गाएगी
ए मेरी जिंदगी! तू मेरे साथ बैठ..
साथ बैठ और...इन्तेज़ार  कर..

'उसका'

के फिर किसी रोज तेरे पास
जब 'वो' मुझे ढूंढती आएगी
ए मेरी जिंदगी! तू उसके साथ बैठना
साथ बैठना और...इन्तज़ार करना

'मेरा'

के मैं आऊँगा वापस या
कोई हवा मेरी खबर लाएगी
ए मेरी जिंदगी ! हर हाल में 'मुस्कुराती' रहना
मुस्कुराना और...ख़याल रखना

'अपना'

- साकेत 

Wednesday, December 10, 2014

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कोई और होगा...

बहती हवा का शोर होगा
ध्यान से देख...कोई और होगा |

आंसुओं से लिख जाते थे खत कभी तुझको
वो भी भला कोई वक्त होगा...कोई दौर होगा |

तमाम शहर लूट कर वो महलों में बसता है
भूखे ने रोटी क्या चुरा ली...लोग कहने लगे 'चोर होगा' |

दरख़्त की तरह वो ताउम्र, रिश्तों के शाख जोड़ता रहा
रिश्ते यूँ पत्तों की तरह बिखरे...हवा का ज़ोर होगा |

वक्त क्या बदला, लोग भी बदल गए
इस ज़माने का यही तरीका...यही तौर होगा |

शांत आसमां है, सब कुछ देखता है, लोग भूल जाते हैं
इस आसमाँ का, बरसता हुआ कोई...छोर होगा |

वो इसी दुनिया में मिला मुझसे...जो अब सितारों में बसता है
आँखें नम हैं, दर्द वक्त के साथ...शायद कमजोर होगा |


- साकेत