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Sunday, August 20, 2017

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बदल गए हो तुम

के हर मोड़ पर पीछे मुड़कर देखा है
शायद! बहोत आगे निकल गए हो तुम ।

एक दौर बीता है, अब भी सुलग रहा हूँ मैं,
पत्थर हो आज भी, या पिघल गए हो तुम ?

मुदात्तों मिन्नतें की हैं, तू बहके, मैं संभाल लूं
कोशिशें की है, क्यूँ हर बार संभल गए हो तुम ?

मुझे उल्फ़त की मायूस गलियों ने मुहाज़िर लिखा है
कोई पूछ देता है, तो कह देते हैं, कल गए हो तुम ।

रोज़ ख्वाबों में जाग, तेरी धुंधली तस्वीर बनाई है
के अब ज़माना कहता है, बदल गए हो तुम ।

साकेत




मुहाज़िर  - immigrant, refugee

Thursday, January 5, 2017

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बरसात बनके रहता है

बेवक्त बेमौसम बरसात बनके रहता है
वो मेरी आँखों में ख़्वाब बनके रहता है

सवालों में उलझी हुई है जिंदगी, वो
जिंदगी से मिला जवाब बनके रहता है

नशा, नशा नहीं तो और क्या होगा
वो जो प्यालों में शराब बनके रहता है

हसीं चेहरा खुश भी हो क्या ज़रुरी है
चेहरा जो चेहरे पर नकाब बनके रहता है

अपना लाज़मी होना, लाज़मी नहीं समझता
जो दिल में हसरत बेहिसाब बनके रहता है

बेवक्त बेमौसम बरसात बनके रहता है...

Saturday, September 19, 2015

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खुदा मिला उसे...

खुदा मिला उसे, नेमत छोटी माँग ली
घर पर बच्चा भूखा था, माँ ने रोटी माँग ली

मखमली चादर चढ़ने लगे, बेटों की ख्वाहिश में
वो गरीब जाहिल ठहरा, उसने बेटी माँग ली

कल उसने सरहद पर अपना सबकुछ खोया है
मुआवज़े में नाम अपने, उसकी चिट्ठी माँग ली

दूर मुल्क भूले, भटकते रहे ताउम्र, लौट कर आए
दो गज़ ज़मीन, हवा, काम भर मिट्टी माँग ली

उम्मीद का दीया, रोशन, घर उसके दिवाली आएगी
पसीना बेच तेल ले आया, तो उसने बत्ती माँग ली

किसी ने बंगला माँगा, तमाम शोहरतें माँग ली
ज़रूरतें कम थीं बच्चे की, उसने कॉपी माँग ली 

खुदा मिला उसे...
साकेत




नेमत  - reward, gift, boon, beneficence

Wednesday, July 15, 2015

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वाकिफ़ हूँ मैं...


ए वक्त तेरी फ़ितरत से वाकिफ़ हूँ मैं
ग़ालिब हूँ, अपनी किस्मत से वाकिफ़ हूँ मैं ‍‌

एक उम्र से इन दूरियों का लिहाज़ किया है मैंने
तेरे मेरे बीच की हर सरहद से वाकिफ़ हूँ मैं

सियासत की बिसात का कोई गुमनाम प्यादा हूँ
बादशाह! जज़्बात-ए-हुकूमत से वाकिफ़ हूँ मैं

मैंने हर इक दंगे में अपने बच्चे गवाएँ हैं
खुदा हूँ, इंसानी नफ़रत से वाकिफ़ हूँ मैं

बेबस अस्मत सुनाती है किस्से शराफ़त के
हवस हूँ, 'शरीफ़ों' की नीयत से वाकिफ़ हूँ मैं

वो इशारों के खेल, लटों को हलके से सहलाना
नज़र हूँ, हुस्न की हर हरकत से वाकिफ़ हूँ मैं

रफ़ाह-ए-कुरबत-ओ-वजा-ए-हिज़्र
दिल हूँ, उसकी उल्फ़त से वाकिफ़ हूँ मैं

सुन शरार-ए-आसमां-ओ-बाद-ए-ख़िज़ाँ
शज़र हूँ, अपनी ताकत से वाकिफ़ हूँ मैं

साकेत




अस्मत - honor
रफ़ाह-ए-कुरबत - pleasure of nearness
वजा-ए-हिज़्र - gloom of separation
उल्फ़त - love

शरार-ए-आसमां - lightning
बाद-ए-ख़िज़ाँ - wind of autumn/fall
शज़र - tree

Thursday, January 22, 2015

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रुका हुआ सा है...


रुका हुआ सा है, क्यूँ घर नहीं जाता
ये रास्ता शायद उसके शहर नहीं जाता |

जुदा होना, होकर टूट जाना, मुक्क़दर है उसका
समंदर लाख चाहे, तूफ़ान, ठहर नहीं जाता

ये लोग ही हैं जो सींचते, फिर पत्थर मारते हैं
लोग ही आते हैं पास कभी, शज़र नहीं जाता |

कायनात से पूछना फ़र्क कभी माँ और बेटे में
दरिया मिटकर भी मिलती है, समंदर नहीं जाता |

मिटे तो मिटेंगे इक दिन ख़ाक में मिल जायेंगे
बस यूँही मिट जाने का, ये डर नहीं जाता |

सियासत हुनर है ज़ख्म देकर ज़हर लगाने का
वक्त के साथ ज़ख्मों का असर नहीं जाता |

कुछ तो बात होगी जो अब सजदे क़ुबूल नहीं उसे
वरना दर से कोई उसके, इस कदर नहीं जाता |

शादाब सा गाँव था, वो खराबों सा शहर
परिंदा कोई, अब, उधर नहीं जाता |

हादसे में अपने गवाएँ, आँखें भी चली गईं
बस आँखों के आगे से, वो मंज़र नहीं जाता |

दूर मुल्क, उसके बच्चे कहीं भूखे न सो जाएँ
कहीं हर रात निवाला पेट के अंदर नहीं जाता |

रुका हुआ सा है...घर नहीं जाता...

साकेत




कायनात  - nature, universe
शज़र - tree

शादाब - verdant, blooming green
ख़राब - spoiled, ruined