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Thursday, November 30, 2017

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परिंदे यहाँ हैं


सहरा है, समंदर है, गुज़र कहाँ है
परिंदे यहाँ हैं, उनका शज़र कहाँ है

हम गुम से हैं अब अपने ही शहर में
मकान ही मकान हैं, मेरा घर कहाँ है

तुम साथ होते, तो जहाँ भी जीत लेते
पत्थरों को तराशने का हुनर कहाँ है

मर्ज़ ये के उम्मीद लगा बैठा है जिंदगी से
दवा है, उसके हिस्से का ज़हर कहाँ है

अपने गिरेबान में झांका है, तो पाया है
खुदा का निशान तो है, बशर कहाँ है

परिंदे यहाँ हैं...

साकेत




सहरा - desert
शज़र - tree
गुज़र - way/path
बशर - humanity/mankind

Sunday, November 19, 2017

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नाम आते आते



ज़िन्दगी, किताब, किस्से, किरदार, नाम आते आते
के चंद पन्ने ही पलट सकें हैं हम, शाम आते आते

शब स्याह हुई, मेरे किस्से तेरी कहानियों से जा मिले
के सफ़र याद रह गया हमसफर! क़याम आते आते

कुछ वक्त की तल्खियाँ हैं, कुछ ज़माने के दायरे
रफ़्ता-रफ़्ता बहक रहा हूँ, जो तेरा नाम आते आते

तेरी सोहबत का असर है, अब तूफ़ां का डर नहीं मुझे
बेफ़िक्र परिंदे उड़ चले हैं, हवाओं का पयाम आते आते

खुमारी का आलम ये, के मैकदों की तलब नहीं, जुस्तजू नहीं
नशा भी कुछ यों के अब नशे में हूँ मैं, ये जाम आते आते

बेबाक हँसी रुख्सार पर, लबों पर मासूम तकाज़े
तेरे हो चलें हैं मेरे सारे हर्फ़, ये कलाम आते आते

दिल शीशे की बनावट है, इसे आफ़ताब-ए-हसरत है
टूट के जो बिखरे, तो संभाल लेना, अंजाम आते आते

जिंदगी किताब किस्से किरदार, नाम आते आते...

साकेत




शब - night
स्याह - black / dark
कयाम - halt / stay

तल्खियाँ - bitterness
रफ़्ता-रफ़्ता - gradually
सोहबत - association / companionship
पयाम - message
खुमारी - intoxication
मैकदा - bar
तलब - desire
जुस्तजू - quest
रुख्सार - cheeks
तकाज़े - demands
हर्फ़ - letters / alphabets
कलाम - a complete sentence / composition
आफ़ताब - sun

Friday, November 17, 2017

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सर्द सर्द सा



के सर्द-सर्द सा पतझड़ में, फिर ज़र्द-ज़र्द हो गिरता हूँ
तुम दर्ज़-दर्ज़ हो पन्नों पर, मैं हर्फ़-हर्फ़ जो लिखता हूँ

तुम लहर-लहर सी आकर क्यों, छेड़ मुझे यूँ जाती हो
मैं रेत-महल सा साहिल पर, फिर बनता और बिखरता हूँ

भोर सुबह की पहली किरण, तुम आफ़ताब सा नूरानी
मैं मोम-मोम सा रातों में, क्यों जलता और पिघलता हूँ

वक़्त-वक़्त सी पल-पल तुम, गुज़र-गुज़र सी जाती हो
मैं लम्हा-लम्हा सदियों में, अब उलझ-उलझ कर रहता हूँ

तुम बात-बात पर आकर के, यूँ हक़ से हक़ जतलाते हो
मैं फ़िक्र-फ़िक्र सा आँखों में, फिर दिखता और झलकता हूँ

तुम बूंद-बूंद सी बारिश में, जो टूट-टूट कर बरसे थे
फिर सहरा-सहरा बन कर क्यों, मैं बूंद-बूंद को तरसा हूँ

साकेत




ज़र्द - yellow, pale
आफ़ताब - sun
नूरानी - luminous

सहरा - desert

Sunday, November 5, 2017

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मलबा हुआ है



किस खुदा के हुक्म से ये धुआं उठा है
मेरे सामने ये हसीं शहर मलबा हुआ है

वो किसी मज़हब का हो फ़र्क़ नहीं पड़ता
मासूम खून जो सड़कों पर बिखरा हुआ है

भूख का वास्ता रोटी से है, जन्नत से नहीं
उसे जवाब में किस रंग का झंडा मिला है

एक-एक सींक जोड़, आशियाँ सजाया था
जिस परिंदे को आज घोसला उजड़ा मिला है

जन्नत उजाड़ दी दूजी जन्नत की चाहत में
माँ की लाश पर बिलखता बच्चा मिला है

मुल्क तो बिस्मिल का भी था, अशफ़ाक़ का भी
किसको मुज़फ्फरनगर, किसको गोधरा मिला है

साकेत


Sunday, September 24, 2017

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कब बसे थे



कब बसे थे, के कब उजाड़े गए
हम फसाद की तरह बिगाड़े गए

जम्हूरियत पर लगी जंग सियासती
फिर हम परत दर परत उखाड़े गए

कल उसने वहशत को ज़िहाद पढ़ा
के आज कुछ मासूम और मारे गए

परदेस, मिट्टी को पहचान बना देता है
जब भी गए, माँ के नाम से पुकारे गए

उम्र भर हुक्मरानों के पासबाँ बने रहे
जो आज प्यादों की तरह नकारे गए

गलती की, गलत को गलत कह दिया
हम हर एक गलती के लिए सुधारे गए

कब बसे थे, के कब उजाड़े गए...

साकेत




जम्हूरियत - democracy
सियासत   - politics
वहशत     - savageryहुक्मरान   - ruler, king
पासबाँ     - protector, guard/sentinel