Feature Label Area

Tuesday, May 1, 2018

Tagged under: ,

मुझे याद रख


दिल-ए-बे-दिल, नाशाद रख
मुझे भूल जा, मुझे याद रख

सफ़ेद लिख, या स्याह रख
मेरे नाम को, तेरे बाद रख

मुझे रास्तों की खबर नहीं
मुझे काफ़िले में साथ रख

यहाँ हर तरफ़ बस हुजूम है
शहर-ए-बे-क़दर, बर्बाद रख

मैं मुल्क हूँ, नई सोच का
जम्हूरियत, आबाद रख

बहल जा दिल-ए-खुशफ़हम
उसे भूल कर, उसे याद रख



साकेत




नाशाद - unhappy
स्याह - black
हुजूम - crowd
बे-क़दर - ungrateful
जम्हूरियत - democracy
खुशफ़हम - optimist


Tuesday, March 27, 2018

Tagged under: ,

ज़माने याद आए


फिर तारों तले मिलने के बहाने याद आए
आज आसमाँ देखा, वो ज़माने याद आए


हर एक वरक़ पर हमने तुमको लिखा था
एक एक कर जो वाकये पुराने याद आए

और शाम छेड़ गयी इक धुन मायूसी की
हमें उस नदी किनारे, वो तराने याद आए

शब-ए-ख़्वाब, सहर-ए-धूप में पिघल गए
हमने आँखें खोली, तो फसाने याद आए

मैकदे बैठे रात भर, और देखते रहे शराब को
ज़ुल्फ़ों की छाँव, आँखों के पैमाने याद आए

एक वायदों की लकीर थी और आरज़ू ए सैलाब
कुछ निभा चले थे हम, कुछ निभाने याद आए



साकेत




वरक़ - paper
सहर - morning
मैकदा - bar, tavern

Thursday, March 8, 2018

Tagged under: ,

तिरे इश्क़ की इंतिहा

मोहम्मद इकबाल उर्फ़ अलाम्मा इकबाल, उर्दू शायरी की दुनिया का वो नाम जिसे अदब की स्याही से लिखा जाता रहा है | इकबाल का ओहदा उफुक की बुलंदियों पर रौशन सितारे की तरह मुकम्मल है, कल, आज, ताउम्र | वक्त बेवक्त कलाम-ए-इकबाल से मुखातिब हो जाना अब आदत की तरह है | बीते दिनों, इत्तेफाकन इकबाल साहब की एक ग़ज़ल "तेरे इश्क की इन्तेहाँ चाहता हूँ ", से रूबरू हुए, ज़र्या असरार साहब की रूहानी आवाज़ थी, हवा में घुल कर जेहेन तक असर कर गई | बात यहाँ तक भी रहती तो लिखने का मकसद न होता, मतलब न होता | बात बढ़ने लगी, आदत , फिर जूनून, फिर फितूर की शक्ल इख्तियार करने लगी और फिर दौर आया कलम की गुस्ताखियों का |
'बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ'
कलम की गुस्ताखियाँ आज बेचैन बैठीं हैं ज़ाहिर हो जाने को और बे-अदब इकबाल साहब के अंदाज़ में बयान हो जाने को...





तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ

सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबी
कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ

ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ

ज़रा सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना
वही लन-तरानी सुना चाहता हूँ

कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल
चराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ




इकबाल



बड़ी देर से चल, बड़े दूर से हूँ
मैं तेरे शहर में पनाह चाहता हूँ

राहें सितमगर, और तेरी वफ़ा है
मैं आँखों के आगे धुँआ चाहता

टूटे सितारों से माँगी दुआ है
सितारों से आगे जहाँ चाहता हूँ

तुमसे गुलों का ये बाजार गुलशन
मैं खुश्बू में तेरी घुला चाहता हूँ

जज़्बात ओ जुनूँ हो, फ़ितूर बन चुके हो
क्या तुमको बताऊं, किस तरह चाहता हूँ

मकाम-ओ-मंज़िल, रास्ता तुम्ही हो
मैं तुम्हारे सिवा कुछ कहाँ चाहता हूँ


साकेत






Tagged under: ,

आशियाँ बनाती है


तिनका तिनका रेज़ा रेज़ा, घरौंदा बनाती है
कायनात ए करिश्मा है, आशियाँ बनाती है

ठंडक आब सी है, फिर तपिश आग सी
मिट्टी के खिलौने को, माँ इंसान बनाती है

हर साल कलाई पर, भरोसा बाँध देती है
पासबाँ बनाती है, बहन चट्टान बनाती है

ज़मीं छोड़ अपनी, आसमां छोड़ आती है
हाथ थाम कर फिर, नयी दास्ताँ बनाती है

सजदों से हासिल है, उसे दौलत बेशकीमती
बेटियाँ घर आकार जिसे, शहंशाह बनाती हैं


साकेत




रेज़ा-रेज़ा - gradually
आब - water
पासबाँ - protector
 सजदा - prayers

Thursday, November 30, 2017

Tagged under: ,

परिंदे यहाँ हैं


सहरा है, समंदर है, गुज़र कहाँ है
परिंदे यहाँ हैं, उनका शज़र कहाँ है

हम गुम से हैं अब अपने ही शहर में
मकान ही मकान हैं, मेरा घर कहाँ है

तुम साथ होते, तो जहाँ भी जीत लेते
पत्थरों को तराशने का हुनर कहाँ है

मर्ज़ ये के उम्मीद लगा बैठा है जिंदगी से
दवा है, उसके हिस्से का ज़हर कहाँ है

अपने गिरेबान में झांका है, तो पाया है
खुदा का निशान तो है, बशर कहाँ है

परिंदे यहाँ हैं...

साकेत




सहरा - desert
शज़र - tree
गुज़र - way/path
बशर - humanity/mankind