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Sunday, September 24, 2017

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कब बसे थे



कब बसे थे, के कब उजाड़े गए
हम फसाद की तरह बिगाड़े गए

जम्हूरियत पर लगी जंग सियासती
फिर हम परत दर परत उखाड़े गए

कल उसने वहशत को ज़िहाद पढ़ा
के आज कुछ मासूम और मारे गए

परदेस, मिट्टी को पहचान बना देता है
जब भी गए, माँ के नाम से पुकारे गए

उम्र भर हुक्मरानों के पासबाँ बने रहे
जो आज प्यादों की तरह नकारे गए

गलती की, गलत को गलत कह दिया
हम हर एक गलती के लिए सुधारे गए

कब बसे थे, के कब उजाड़े गए...

साकेत




जम्हूरियत - democracy
सियासत   - politics
वहशत     - savageryहुक्मरान   - ruler, king
पासबाँ     - protector, guard/sentinel

Sunday, August 20, 2017

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बदल गए हो तुम

के हर मोड़ पर पीछे मुड़कर देखा है
शायद! बहोत आगे निकल गए हो तुम ।

एक दौर बीता है, अब भी सुलग रहा हूँ मैं,
पत्थर हो आज भी, या पिघल गए हो तुम ?

मुदात्तों मिन्नतें की हैं, तू बहके, मैं संभाल लूं
कोशिशें की है, क्यूँ हर बार संभल गए हो तुम ?

मुझे उल्फ़त की मायूस गलियों ने मुहाज़िर लिखा है
कोई पूछ देता है, तो कह देते हैं, कल गए हो तुम ।

रोज़ ख्वाबों में जाग, तेरी धुंधली तस्वीर बनाई है
के अब ज़माना कहता है, बदल गए हो तुम ।

साकेत




मुहाज़िर  - immigrant, refugee

Thursday, January 5, 2017

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बरसात बनके रहता है

बेवक्त बेमौसम बरसात बनके रहता है
वो मेरी आँखों में ख़्वाब बनके रहता है

सवालों में उलझी हुई है जिंदगी, वो
जिंदगी से मिला जवाब बनके रहता है

नशा, नशा नहीं तो और क्या होगा
वो जो प्यालों में शराब बनके रहता है

हसीं चेहरा खुश भी हो क्या ज़रुरी है
चेहरा जो चेहरे पर नकाब बनके रहता है

अपना लाज़मी होना, लाज़मी नहीं समझता
जो दिल में हसरत बेहिसाब बनके रहता है

बेवक्त बेमौसम बरसात बनके रहता है...

Saturday, September 19, 2015

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खुदा मिला उसे...

खुदा मिला उसे, नेमत छोटी माँग ली
घर पर बच्चा भूखा था, माँ ने रोटी माँग ली

मखमली चादर चढ़ने लगे, बेटों की ख्वाहिश में
वो गरीब जाहिल ठहरा, उसने बेटी माँग ली

कल उसने सरहद पर अपना सबकुछ खोया है
मुआवज़े में नाम अपने, उसकी चिट्ठी माँग ली

दूर मुल्क भूले, भटकते रहे ताउम्र, लौट कर आए
दो गज़ ज़मीन, हवा, काम भर मिट्टी माँग ली

उम्मीद का दीया, रोशन, घर उसके दिवाली आएगी
पसीना बेच तेल ले आया, तो उसने बत्ती माँग ली

किसी ने बंगला माँगा, तमाम शोहरतें माँग ली
ज़रूरतें कम थीं बच्चे की, उसने कॉपी माँग ली 

खुदा मिला उसे...
साकेत




नेमत  - reward, gift, boon, beneficence

Wednesday, July 15, 2015

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वाकिफ़ हूँ मैं...


ए वक्त तेरी फ़ितरत से वाकिफ़ हूँ मैं
ग़ालिब हूँ, अपनी किस्मत से वाकिफ़ हूँ मैं ‍‌

एक उम्र से इन दूरियों का लिहाज़ किया है मैंने
तेरे मेरे बीच की हर सरहद से वाकिफ़ हूँ मैं

सियासत की बिसात का कोई गुमनाम प्यादा हूँ
बादशाह! जज़्बात-ए-हुकूमत से वाकिफ़ हूँ मैं

मैंने हर इक दंगे में अपने बच्चे गवाएँ हैं
खुदा हूँ, इंसानी नफ़रत से वाकिफ़ हूँ मैं

बेबस अस्मत सुनाती है किस्से शराफ़त के
हवस हूँ, 'शरीफ़ों' की नीयत से वाकिफ़ हूँ मैं

वो इशारों के खेल, लटों को हलके से सहलाना
नज़र हूँ, हुस्न की हर हरकत से वाकिफ़ हूँ मैं

रफ़ाह-ए-कुरबत-ओ-वजा-ए-हिज़्र
दिल हूँ, उसकी उल्फ़त से वाकिफ़ हूँ मैं

सुन शरार-ए-आसमां-ओ-बाद-ए-ख़िज़ाँ
शज़र हूँ, अपनी ताकत से वाकिफ़ हूँ मैं

साकेत




अस्मत - honor
रफ़ाह-ए-कुरबत - pleasure of nearness
वजा-ए-हिज़्र - gloom of separation
उल्फ़त - love

शरार-ए-आसमां - lightning
बाद-ए-ख़िज़ाँ - wind of autumn/fall
शज़र - tree