Sunday, September 28, 2014

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ढूंढते रहे...

मंदिरों में ढूंढते रहे हम, उसे मस्जिदों में ढूंढते रहे
जो बहता था संग हवाओं के, उसे बंद कमरों में ढूंढते रहे |

जिंदगी मिला करती थी कभी मुझसे, मेरे गाँव की गलियों में
इक हम थे जो ताउम्र उसे, इन शहरों में ढूंढते रहे |

सौ बातें कर जाती थी वो, एक नज़र के झोंके से
जो बात हसीं थी 'उस'
चेहरे में, उसे हसीं चेहरों में ढूंढते रहे |

रेत बने घरोंदों को देख,
कोई हँसी कहीं खिल जाती थी
साहिल बैठी रोती रही 'वो',
जिसे हम लहरों में ढूंढते रहे |

इक छोटी सी चिड़िया भी थी, घर मेरे कभी आती थी
जो उम्र गुज़री, तो याद पड़ी, उसे हम शज़रों में ढूंढते रहे |

वो चाँद था 'किसी' रात का, सुबह तक मेरी खातिर रुकता था
भूल हुई, ज़रा-सी देर हुई हम,
उसे दोपहरों में ढूंढते रहे |



- साकेत 

Friday, September 26, 2014

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ख्वाब था शायद !


आँचल का साया, चन्दन...
डांट मिश्री की गोली लगती है |
जब भी मेरी माँ हँसती है
मुझे जिंदगी होली लगती है |

अब किस 'अपने' से मिलें
इस गैर से शहर में,
यहाँ नुक्कड़-नुक्कड़
रिश्तों की बोली लगती है |

देने वाले ने देने को 
उसे पूरी कायनात दे दी,
उसे आज भी खाली
अपनी झोली लगती है |

कल अर्से बाद सड़कों पर
कोई बेतहाशा नाच रहा था,
किसी को कहते सुना "आवारा, मदमस्त,
'गँवारों' की टोली लगती है |"

वो बेपरवाह नाच रहा था, 
बेहिचक जी रहा था |
ख्वाब था शायद ! उसने अभी
नींद से आँखें खोली लगती हैं |



- साकेत

Friday, September 19, 2014

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तुम

अधूरा चाँद
पूरा आकाश
दूधिया रोश्नी
जूझता प्रकाश
बुझता दीपक

अँधेरा...

मिटाने का प्रयास
जागती रातें
सवेरे की आस

हर रात...

अकेला मैं
मेरे साथ
'तुम'

- साकेत 

Wednesday, September 17, 2014

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शहर की हवा

थी रज़ा उसकी,
हम दुआ बन गए |

ये शहर की हवा थी,
बहते-बहते अफवाह बन गए |

किसी के होंठों की हँसी बनते,

बनते-बनते इक सजा बन गए |
ये शहर की हवा थी,
क्या बनते...हम क्या बन गए |

घर बनते-बनते महज़,
इक मकां बन गए |
जो चले थे सबा बनने,
हम...इसी शहर की हवा बन गए |


- साकेत