कोमल नन्हे जीवन की,
त्रासदी एक सुनाता हूँ।
जीवन की एक कटु सच्चाई,
आज तुम्हे बतलाता हूँ।
उठ भोर पहर सारे कदम,
जिस स्कूल ओर बढ़ जाते हैं।
साफ़ उसी प्रांगण को करने,
ये कोमल कर लहराते हैं।
लघु जीवन के पन्नों पर,
छिंटी भूख की स्याही है।
चहुँओर गरीबी के संग,
महंगाई 'डायन' ब्याही है।
भर दोपहर कूड़े-करकट के,
ढेर में जीवन गुज़रता है।
'ए फॉर एप्पल', 'बी फॉर बॉल' तो,
सचमुच विदेश सा लगता है।
दोपहर की पशोपेश बाद,
शाम को घर जब जाते हैं।
'शराब' के हाथों 'माँ' पिटती देख,
आखों आंसू आते हैं।
रोती माँ की सूखी रोटी भी,
भीगी-भीगी लगती है।
मन पूछ-पूछ कर रुक जाता है,
माँ तू क्यूँ सब सहती है?
सूखी रोटी की क्या बिसात जो,
पूरा पेट भर पाती है?
ये तो माँ की लोरी है जो,
पेट की भूख मिटाती है।
रात पहर की वेला में,
कोमल सपने आते हैं।
आसमान के तारों के संग,
हम भी स्कूल जाते हैं।
'स्कूल चले हम' के पोस्टर से,
रात की ठंड मिट जाती है।
धन्यवाद उस 'सरकार' का है जो,
पोस्टर 'तो' छपवाती है।
'भारत' बोलना सीख गया हूँ,
'इंडिया' समझ न आई है।
पापी पेट की भाषा सीखते,
जिंदगी पूरी बितायी है।
(ए पाठक)
गाथा त्रासदी की सुन भी गर जब,
तेरा मन न रोएगा।
तब तलक इस 'अतुल्य भारत' में,
यह 'कथानायक' भूखा सोएगा।
हर 'कथानायक' भूखा सोएगा ........................
- साकेत
2 comments
awesome
ReplyDeletethanks!
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