Friday, February 8, 2013

Tagged under: ,

रंग-ए-गुलाब...








गुलाब का दिन जो आया है..
सैलाब-ए-मोहब्बत लाया है |
दिल ने इश्क-ए-नज़राना..
बस अश्कों में ही पाया है |



कैसे रोकूँ ये सैलाब..
कोई देदे एक ज़वाब |
क्यों मेरे लहू का रंग..
है क्यों रंग-ए-गुलाब |



जब खून किसी का बहता है..
दर्द की एक कहानी है |
फिर भी ये लाल रंग..
क्यों इश्क-ए-निशानी है |



लाल रंग से रोके तू..
क़तार तेरी इन सड़कों पर |
तेरी यही कहानी है..
फिर भी ये लाल रंग...
क्यों इश्क-ए-निशानी है ?



फिर चाहा तुझे, तेरे देखे ख्व़ाब...
मिला मुझे वो एक ज़वाब |
क्यों मेरे लहू का रंग...
है ये रंग-ए-गुलाब |



हर खून की बूँद में तू बसती...
मुझ में छुपती खिलती हँसती |
गर बूँदें खून की खो दूँ मैं...
तुझको तो भी खो दूँ मैं |



 लहू में इश्क जो बसा तेरा..
कैसे मैं बयाँ करूँ ?
तेरे कसमे वादों को..
कैसे रवा-दवा करूँ ?



दिल को मिला वो एक जवाब...
कर दिया जब इज़हार-ए-गुलाब |
इसलिए मेरे लहू का रंग..
है ये रंग, रंग-ए-गुलाब.....






                - निखिल शर्मा

  


0 comments:

Post a Comment