Sunday, September 29, 2013

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लग जा गले...

रात के दो बज चुके हैं....
"early to bed, early to rise
makes a man healthy, wealthy and wise"

सुना
था किसी ज़माने में...जब ये एक आदत हुआ करती थी |
अब
वक्त बदल गया है, ज़माना बदल गया है, आदतें बदल गई हैं...बदल गई से मतलब ये है की सीधे साफ़ शब्दों में खराब हो चली हैं...
पाँच
मिनट और बीत चुके हैं उस पुराने वक्त के शहर में बसे यादों के मोहल्ले से गुजरते हुए....नींद, हर रात की तरह ही आज भी भारतीय रेल की तरह विलम्ब से चल रही है और कानों में एक हसीन नशा, हर रात की तरह ही रह रह कर फ़ैलता जा रहा है...
पिछले
कुछ वक्त से यही दो बातें हैं, जो मेरे साथ अपना नाता किसी पतिव्रता पत्नी की तरह जोड़कर बैठी हुई हैं...नींद पर तो श्रीमान् साक्षात् कुम्भकर्ण जी का भी बस नहीं चला था तो मैं तो ठहरा पच्चपन किलो का एक शुद्ध मांसाहारी भारतीय नागरिक, जिसकी भारतीय रेल पर आस्था उतनी ही अटूट है जितनी कि आसाराम बापू के भक्तों की उनपर रह गयी होगी...
 
खैर, दूसरी बात पर आते हैं, कि हर रात नींद पाने की हालत में, कुछ महीनों से कोई सुकून सा है जो लता मंगेशकर, श्रेया घोषाल, सुनिधि चौहान, अनुराधा पौडवाल की आवाजों में घुल-मिल कर, किसी मर्ज़-सा असर छोड़ जा रहा है...नींद के आने तक साथ निभा जा रहा है...कोई अजीब सा जादू है जो इनके गले से निकल कर कानों के रास्ते हर रात दिल में उतर जा रहा है...ये जादू शायद!
शायद
इनकी आवाजों का नहीं है...ये शायद कुछ और ही है...कुछ खास...|
ये
जादू 'लग जा गले ' का है...उसे लिख जाने वाली कलम का है शायद...
'राजा मेहँदी अली खान ' की स्याही का जादू मुबारक है, उस ‘मै’ सा मुकम्मल है, जो जब भी किसी हसीन दिलकश आवाज के प्याले में परोसी जाती है...एक नशे में तब्दील हो जाती है |
"लग
जा गले" मेरे लिए महज़, मदमस्त सदाओं के धागों में पिरोये हर्फ के मोतियों की लड़ी रह कर...अब एक आदत, एक जरूरत, एक नशे में तब्दील हो चली है...और नशे की हालत में कुछ गुस्ताखियाँ तो हो ही जाती हैं....और शायद हो भी गयीं हैं |
तो ये मेरी कलम की चंद गुस्ताखियाँ अर्ज करना चाहूँगा, उस कलम के जादूगर के नाम...'राजा मेहँदी अली खान ' के नाम....



 "लग जा गले के फिर ये, हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो...

हमको मिलीं हैं आज ये, घड़ियाँ नसीब से
जी भर के देख लीजिए, हमको करीब से
फिर आपके नसीब में, ये बात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो...

पास आइये के हम नहीं आयेंगे बार बार
बाँहें गले में डाल कर, हम रो लें ज़ार-ज़ार
आँखों से फिर ये प्यार की, बरसात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो..."

- राजा मेहँदी अली खान


लग जा गले के फिर ये, हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो...


तारों के संग बसायेंगे, मिलके नया जहाँ
अम्बर
पे हम सजायेंगे, हमारा आशियाँ
कल
रात फिर तारों की ये, बारात हो हो
शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो न हो...

मत रोक के हो जाने दे, थोड़ी सी गुस्ताखियाँ
धड़कन जो अब सुनाएंगी, सीनों की दास्ताँ              
सीनों में फिर ये आज से, जज़्बात हो हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो हो...

जब भी कभी बैठेंगे हम, तन्हा अँधेरे में
यादें तेरी सहलाएंगी, आकर के फिर हमें
कल रात इन यादों का भी, ये साथ हो हो
शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो न हो...

लग जा गले, थम जाए पल, थम जाए रात भी
थम जाएँ हम, थम जाए कल, हो जाए बरसात भी
इस रात के आगे कभी, फिर रात हो हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो हो...

लग जा गले के फिर ये, हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो...


- साकेत