Sunday, December 22, 2013

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हम क्लोरमिंट क्यूँ खाते हैं ? *

बड़ा ही ठोस व विशुद्ध सा सवाल है.…जिसका किसी भी क्लोरमिंट खाने वाले, न खाने वाले पर औरों को खाते हुए देखने वाले के ज़हन में उठना स्वाभाविक है । तो यहाँ, भारतीय प्रौद्योगिकी संसथान, पवई के सदन एल सी सी -1 1 में मैंने कुछ तीन घंटे और चंद मिनट, इस सवाल की  दान-पेटी में …जवाब की आस में....चढ़ावा समझ कर चढ़ा दिए.…





एक आवश्यक सूचना (Disclaimer)
आगे आने वाली तमाम पंक्तियों में कुछ भी काल्पनिक नहीं है । इनका प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से आपसे, मुझसे...इस देश के हर क्लोरमिंट खाने व ना खाने वाले से गहरा....और बहुत गहरा सम्बन्ध है ।




'मेरा भारत महान' के नारे
हर पंद्रह अगस्त लगाते हैं
बाद गले कि खराश मिटाने
हम क्लोरमिंट खाते हैं


'सत्यमेव जयते' सी बातें
वो स्कूलों में हमें सिखलाते हैं
अब हर दिन ईमान बेच हम
'क्लोरमिंट' खाते और खिलाते हैं

बचपन खेलता है गोद में जिसकी
बाद उसे भूल जाते हैं
क़र्ज़ से उसके…मुँह फेरने खातिर
हम क्लोरमिंट खाते हैं

अपनी बेटियों की  होलिका हम
अपने हाथ जलाते हैं
गर्म राख ठंडा करने को

हम क्लोरमिंट खाते हैं 

शहरों में रहते हैं अब हम
दिलों में कहाँ रह पाते हैं
ये हरी गोली साथ निभाती है कुछ
सो हम क्लोरमिंट खाते है

ज़िन्दगी आसान बनाने के चक्कर में
हम खुद से दूर हो जाते हैं
इस बात से साफ़ मुकर जाने की खातिर
अब
हम क्लोरमिंट खाते हैं

क्लोरमिंट जो खाते हैं हम
तो रैपरों (wrappers) से सड़क सजाते हैं
खुद अपना 'घर' गन्दा करने को

हम क्लोरमिंट खाते हैं 

मेंटॉस (mentos) की गोली भी कहाँ
'दिमाग की बत्ती' जला पाती है
सोते हुए को भला कौन जगाए
हम क्लोरमिंट खाते हैं

महँगाई की मार पड़ी है
अब बाज़ार बड़ा रुलाते हैं 
अठन्नी  की आती है ये
तो
हम क्लोरमिंट खाते हैं

पिछली पंक्ति को पढ़कर
हम मंद-मंद मुस्काते हैं
हम दोनों 'आम आदमी' हैं...भैये

हम दोनों क्लोरमिंट खाते हैं

वो शख्स कोई पागल होगा
ये सब जो लिख जाता है
उसकी लिखावट भूलने की  खातिर
हम क्लोरमिंट खाते हैं


- साकेत


*conditions apply
  दुबारा मत पूछना !!


P.S. This work was produced at an on the spot creative writing event "JUST ABOUT WRITE" @ Mood Indigo 2013.

Saturday, November 16, 2013

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मुश्किल है...- a farewell to the master!!




याद है हमें वो सड़कों का...
यूँ वीरान हो जाना
टीवी कि दुकानों पर लोगों का...
घंटों मेहमान हो जाना...


आदतन सुना करते थे रेडियो पर
किस्से उन पारियों के...
आज फिर उन आदतों का
यूँ बेईमान हो जाना...



वक्त
चलता है और साथ चलते हैं हम.....वक्त बदलता है, हम बदलते हैं और बदलती हैं हमारी आदतें | आदतें....कुछ आदतें जो कभी इतने करीब थी....वक्त की रेत में बह कर....दूर....थोड़ी दूर.....बहुत दूर....होती चली जाती हैं | पुरानी आदतें चली जाती हैं...और नयी आदतें उनकी जगह ठीक वैसे ही ले लेती हैं जैसे कि कोई मकान खाली होने पर नए किरायेदार और 'मॉडर्न' आशिकों का दिल खाली होने पर नयी नवेली गर्लफ्रेंड....तो आदतें वैसी ही होती हैं जैसे कोई गटबंधन सरकार जिसकी बागडोर निर्दलियों के हाथ हो.....जिनके जाने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता....
अगर
कोई चीज़ है जो देर से जाती है तो वो है लत.....नशा !
छुड़ाए नहीं
छूटती है ये लत....चली भी जाए तो असर देर तक रहता है....दूर तक रहता है...
ऐसे ही किसी लत का नाम है सचिन रमेश तेंदुलकर....
२४
साल वाकई बहुत लंबा सफर होता है....ऐसा सफर जो कि मैं भी आज तक पूरा नहीं कर पाया हूँ....फर्क इस बात से नहीं पड़ता कि मैं ये सफर पूरा नहीं कर पाया.....कर पाउँगा ....वाकई नहीं पड़ता है इससे कोई फर्क...फर्क इस बात से पड़ता है कि ये लत...ये नशा जो कि चौबीस साल से हर हिन्दुस्तानी के रग-रग में दौड़ता था....वो आज दूर होने जा रहा है....

आज
सचिन अपना आखिरी टेस्ट खेल रहे हैं और हम सब इस लत....इस नशे की आखिरी खुराक ले रहे हैं....

असर
कहाँ तक साथ होगा...कब तक साथ होगा......
ये
सोच कर नशा कौन करता है भला??

तो
उस चौबीस साल से साथ निभा रहे उस लत के नाम.....उस नशे के नाम जिसे लोग 'भगवान' कहते हैं.....सचिन रमेश तेंदुलकर के नाम....

पाँव ज़मीं पर होना,
आसमान बने रहना...
मुश्किल है सितारा होकर
इंसान बने रहना...

कि जानना भी सबकुछ,
फिर अनजान बने रहना...
मुश्किल है बहुत इस मुल्क में
'भगवान' बने रहना...

चौबीस साल खेलना,
उस खेल की शान बने रहना...
मुश्किल है वक्त की आंधी में
चट्टान बने रहना...

कि तूफ़ान टूट जाते हैं
साहिलों तक आते-आते...
मुश्किल है यूँ ज़ज्बों का
जवान बने रहना...

कि साँसें थाम देने का
हुनर वो खूब जानता था...
मुश्किल है अब साँसों का रुकना
और जान बने रहना...

मुश्किल नहीं यहाँ किसी हस्ती का
यूँ महान हो जाना...
मुश्किल है महान होना
और...
महान बने रहना....


- साकेत

Wednesday, November 6, 2013

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Back in '98...

Back in '98, when I was 4...
'Cricket' was, watching one 5'4" man on the wavering screen of my black n white Weston TV..
A 'bat' for me was always an 'MRF one'..the one that the man in that no. 10 jersey played with..
'Pride' was hitting a six to be called 'Sachin'..

Probably, every right handed kid in India, with a bat in his hands was once a 'Sachin'...I too was...back then.


back then in 98, I did'nt know for how many years that 5'4" was there on that wavering screen..
Back then, I didn't know that MRF was just a company that manufactured tyres...
Back then, I did'nt know much...

But today, when I'm 19, when I know all these round the world stuffs, when the meanings of terms have changed for me...when a colored screen with a digitalised connection has replaced that black n white one,
when Adidas has replaced that MRF...
when I and many more contemporary right hand bats are kids no more...

I still see that 5'4" guy gear up and play with the same zeal and flare out there...and then suddenly
"Sachin anounces retirement"

today, I know all those stuffs, the adidas ones, the MRF ones...questions; answers; whatever, things yet to come, things that I today, remain completely alien to...Cricket without that 5'4" jersey no. 10...
that 'Pride' without a 'sachin' tag...
for sure, MRF will remain MRF, that is not going to change,most probably...But,something or the other will certainly change after that 200th test...

Farewell master!

'Cricket' for that '98 kid will still be that 5'4" man on doordarshan live, till he dies...



- a kid who used to feel good when called 'sachin'
(Saket)






#a_status_on_facebook_the_day_sachin_announced_retirement
dated: Oct 10th, 2013

Sunday, September 29, 2013

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लग जा गले...

रात के दो बज चुके हैं....
"early to bed, early to rise
makes a man healthy, wealthy and wise"

सुना
था किसी ज़माने में...जब ये एक आदत हुआ करती थी |
अब
वक्त बदल गया है, ज़माना बदल गया है, आदतें बदल गई हैं...बदल गई से मतलब ये है की सीधे साफ़ शब्दों में खराब हो चली हैं...
पाँच
मिनट और बीत चुके हैं उस पुराने वक्त के शहर में बसे यादों के मोहल्ले से गुजरते हुए....नींद, हर रात की तरह ही आज भी भारतीय रेल की तरह विलम्ब से चल रही है और कानों में एक हसीन नशा, हर रात की तरह ही रह रह कर फ़ैलता जा रहा है...
पिछले
कुछ वक्त से यही दो बातें हैं, जो मेरे साथ अपना नाता किसी पतिव्रता पत्नी की तरह जोड़कर बैठी हुई हैं...नींद पर तो श्रीमान् साक्षात् कुम्भकर्ण जी का भी बस नहीं चला था तो मैं तो ठहरा पच्चपन किलो का एक शुद्ध मांसाहारी भारतीय नागरिक, जिसकी भारतीय रेल पर आस्था उतनी ही अटूट है जितनी कि आसाराम बापू के भक्तों की उनपर रह गयी होगी...
 
खैर, दूसरी बात पर आते हैं, कि हर रात नींद पाने की हालत में, कुछ महीनों से कोई सुकून सा है जो लता मंगेशकर, श्रेया घोषाल, सुनिधि चौहान, अनुराधा पौडवाल की आवाजों में घुल-मिल कर, किसी मर्ज़-सा असर छोड़ जा रहा है...नींद के आने तक साथ निभा जा रहा है...कोई अजीब सा जादू है जो इनके गले से निकल कर कानों के रास्ते हर रात दिल में उतर जा रहा है...ये जादू शायद!
शायद
इनकी आवाजों का नहीं है...ये शायद कुछ और ही है...कुछ खास...|
ये
जादू 'लग जा गले ' का है...उसे लिख जाने वाली कलम का है शायद...
'राजा मेहँदी अली खान ' की स्याही का जादू मुबारक है, उस ‘मै’ सा मुकम्मल है, जो जब भी किसी हसीन दिलकश आवाज के प्याले में परोसी जाती है...एक नशे में तब्दील हो जाती है |
"लग
जा गले" मेरे लिए महज़, मदमस्त सदाओं के धागों में पिरोये हर्फ के मोतियों की लड़ी रह कर...अब एक आदत, एक जरूरत, एक नशे में तब्दील हो चली है...और नशे की हालत में कुछ गुस्ताखियाँ तो हो ही जाती हैं....और शायद हो भी गयीं हैं |
तो ये मेरी कलम की चंद गुस्ताखियाँ अर्ज करना चाहूँगा, उस कलम के जादूगर के नाम...'राजा मेहँदी अली खान ' के नाम....



 "लग जा गले के फिर ये, हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो...

हमको मिलीं हैं आज ये, घड़ियाँ नसीब से
जी भर के देख लीजिए, हमको करीब से
फिर आपके नसीब में, ये बात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो...

पास आइये के हम नहीं आयेंगे बार बार
बाँहें गले में डाल कर, हम रो लें ज़ार-ज़ार
आँखों से फिर ये प्यार की, बरसात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो..."

- राजा मेहँदी अली खान


लग जा गले के फिर ये, हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो...


तारों के संग बसायेंगे, मिलके नया जहाँ
अम्बर
पे हम सजायेंगे, हमारा आशियाँ
कल
रात फिर तारों की ये, बारात हो हो
शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो न हो...

मत रोक के हो जाने दे, थोड़ी सी गुस्ताखियाँ
धड़कन जो अब सुनाएंगी, सीनों की दास्ताँ              
सीनों में फिर ये आज से, जज़्बात हो हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो हो...

जब भी कभी बैठेंगे हम, तन्हा अँधेरे में
यादें तेरी सहलाएंगी, आकर के फिर हमें
कल रात इन यादों का भी, ये साथ हो हो
शायद फिर इस जनम में मुलाकात हो न हो...

लग जा गले, थम जाए पल, थम जाए रात भी
थम जाएँ हम, थम जाए कल, हो जाए बरसात भी
इस रात के आगे कभी, फिर रात हो हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो हो...

लग जा गले के फिर ये, हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में, मुलाकात हो न हो...


- साकेत