Saturday, October 20, 2012

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मैं फिर तन्हा




पलकों  पे सपने सजाये 
नींदों में उनको बिठाये
डूबे हसीन तरानों में
फिर अनजाने से गानों में 
पिघले से कुछ प्यार की बातें
न ढलती थी कुछ ऐसी रातें
कुछ सरगम कुछ सुर ताल नए 
कुछ ऐसे थे बेहाल हुए 
जीया तुझे फिर इक लम्हा 
आंखे खुली, मैं फिर तन्हा 



फिर उन गलियों में नज़रें बिछाये 
जहाँ देख हमें, थे  तुम मुस्कुराए  
उन बहके से अफसानों में 
फिर गिने गए दीवानों में 
परेशान हम बौखलाहटें
कुछ ऐसी थी तेरी आहटें 
कुछ तुम जो दस्तक देते गए 
उन सारे पलों को समेटे हुए 
जीया तुझे फिर इक लम्हा 
आंखे खुली, मैं फिर तन्हा 



फिर विधालय में पाठ पढाये 
प्यार के जो दिए जलाये
फिर नए हम अंजानों में
कुछ ऐसे थे नादानों में 
फिर धडके दिल तेरे हाथ तो थामें 
बुझते सूरज की वो जलती शामें 
जो तेरी बाहों में खोते गए 
मदमस्त से हम जो होते गए 
जीया तुझे फिर इक लम्हा 
आंखे खुली, मैं फिर तन्हा 


मैं चलता तेरी यादों में 
तेरी यादों में मैं फिर गिरता हूँ
फिर गिरता तेरी यादों में 
कुछ ऐसे मई संभालता हूँ 
हैं बस यादें तेरी पास मेरे 
प्यारे से एहसास तेरे 
जीता हूँ,  तुझे जी जाऊँगा    
नशा तेरा जब पी जाऊँगा 
फिर आएगा वो इक लम्हा
आँखे बंद, मैं फिर तन्हा........



-  निखिल शर्मा 

Thursday, October 18, 2012

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अतुल्य भारत !

 कोमल नन्हे जीवन की,
त्रासदी एक सुनाता हूँ।
जीवन की एक कटु सच्चाई,
आज तुम्हे बतलाता हूँ।


उठ भोर पहर सारे कदम,
 जिस स्कूल ओर बढ़ जाते हैं।
साफ़ उसी प्रांगण को करने,
ये कोमल कर लहराते हैं।

लघु जीवन के पन्नों पर,
छिंटी भूख की स्याही है।
चहुँओर गरीबी के संग,
महंगाई 'डायन' ब्याही है।


भर दोपहर कूड़े-करकट के,
ढेर में जीवन गुज़रता है।
'ए फॉर एप्पल', 'बी फॉर बॉल' तो,
सचमुच विदेश सा लगता है।

दोपहर की पशोपेश बाद,
शाम को घर जब जाते हैं।
'शराब' के हाथों 'माँ' पिटती देख,
आखों आंसू आते हैं।


रोती माँ की सूखी रोटी भी,
भीगी-भीगी लगती है।
मन पूछ-पूछ कर रुक जाता है,
माँ तू क्यूँ सब सहती है?

सूखी रोटी की क्या बिसात जो,
पूरा पेट भर पाती है?
ये तो माँ की लोरी है जो,
पेट की भूख मिटाती है।

रात पहर की वेला में,
कोमल सपने आते हैं।
आसमान के तारों के संग,
हम भी स्कूल जाते हैं।


'स्कूल चले हम' के पोस्टर से,
रात की ठंड मिट जाती है।
धन्यवाद उस 'सरकार' का है जो,
पोस्टर 'तो' छपवाती है।

'भारत' बोलना सीख गया हूँ,
'इंडिया' समझ न आई है।
पापी पेट की भाषा सीखते,
जिंदगी पूरी बितायी है।

(ए पाठक)  

गाथा त्रासदी की सुन भी गर जब,
तेरा मन न रोएगा।
तब तलक इस 'अतुल्य भारत' में,
यह 'कथानायक' भूखा सोएगा।

हर 'कथानायक' भूखा सोएगा ........................



- साकेत 

   



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कागज़ की फसल

पहुँच गया सरकारी दफ़्तर ,
करने कागजी कार्यवाही।
चपरासी ने भी ना पूछा ,
यही है नौकरशाही।


खड़े खड़े इंतज़ार में सहसा ,
नज़र कहीं टकराई।
कैसे अलमारी भर भर 'बाबुओं' ने ,
है कागज़ की फसल उगाई।

अलमारी की दशा देखकर ,
मन आस बंध आई।
बिना धैर्य है नियति ने ,
किसे सफलता चखाई।

दूर चपरासी की आवाज़ सुन ,
मन में है ख़ुशी समाई।
आज मनो किस्मत भी हमपर ,
मंद मंद मुस्काई।


उठ दौड़ भाग बाबु के कमरे ,
हमने आसन जमाया।
'बिजी बाबु' के दर्शन हो गए ,
चरों धाम घूम आया।

स्थिरचित होकर सारे कागज़,
जब हमने बाबु को सौंपे।
कागज़ के कलपुर्ज़े निकाल कर ,
बाबु हमपर भौंके।

मन सिहर उठा, तन पर जैसे ,
बिजली कोई गिर आई।
एक सिरे से 'भगवन' ने जब ,
सैकड़ों गलतियाँ गिनवाई ||


गल्ती गिनवाने पश्चात 'भगवन' ,
'मानव' रूप में आए।
बोले, भक्त हूँ संविधान का ,
हैं 'गाँधी' मन में समाए।

मैं नादान 'प्रभुवाणी' का ,
तनिक बोध न कर पाया।
चपरासी की 'हिन्ट' पर कुछ-कुछ ,
माज़रा समझ में आया।

गाँधी-भक्ति में रमे हुए को मैंने ,
जब गाँधी-दर्शन करवाए।
तब जाकर कागज़ के मेरे ,
पाप कहीं धुल पाए।


(समझ गया)

कागज़ की इन फसलों के पीछे ,
गाँधी-प्रेम समाया है।

(शर्म आती है)

आज हमने भी ईमान बेचकर ,
इन फसलों को सिंचवाया है।


                        - साकेत


Wednesday, October 17, 2012

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Rebooting....

वैसे मेरा नाम  'साकेत' है .... 



They say time flies. Really, the time has flown. I started my blog, I wrote a few posts, then encountered few roadblocks...lost my blog...and now I am again giving it a fresh start. So stay tuned for more....and let the pen do the talking. Take care!
             
           
               उन्हें अंज़ाम की क्या फिक्र,
               जो  शुरुआतों में यकीन रखते हैं।
               करते है अन्ज़ामेज़िक्र वो ,
               जिनकी शुरुआत ही दूर होती है।