Sunday, August 20, 2017

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बदल गए हो तुम

के हर मोड़ पर पीछे मुड़कर देखा है
शायद! बहोत आगे निकल गए हो तुम ।

एक दौर बीता है, अब भी सुलग रहा हूँ मैं,
पत्थर हो आज भी, या पिघल गए हो तुम ?

मुदात्तों मिन्नतें की हैं, तू बहके, मैं संभाल लूं
कोशिशें की है, क्यूँ हर बार संभल गए हो तुम ?

मुझे उल्फ़त की मायूस गलियों ने मुहाज़िर लिखा है
कोई पूछ देता है, तो कह देते हैं, कल गए हो तुम ।

रोज़ ख्वाबों में जाग, तेरी धुंधली तस्वीर बनाई है
के अब ज़माना कहता है, बदल गए हो तुम ।

साकेत




मुहाज़िर  - immigrant, refugee