Friday, November 17, 2017

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सर्द सर्द सा



के सर्द-सर्द सा पतझड़ में, फिर ज़र्द-ज़र्द हो गिरता हूँ
तुम दर्ज़-दर्ज़ हो पन्नों पर, मैं हर्फ़-हर्फ़ जो लिखता हूँ

तुम लहर-लहर सी आकर क्यों, छेड़ मुझे यूँ जाती हो
मैं रेत-महल सा साहिल पर, फिर बनता और बिखरता हूँ

भोर सुबह की पहली किरण, तुम आफ़ताब सा नूरानी
मैं मोम-मोम सा रातों में, क्यों जलता और पिघलता हूँ

वक़्त-वक़्त सी पल-पल तुम, गुज़र-गुज़र सी जाती हो
मैं लम्हा-लम्हा सदियों में, अब उलझ-उलझ कर रहता हूँ

तुम बात-बात पर आकर के, यूँ हक़ से हक़ जतलाते हो
मैं फ़िक्र-फ़िक्र सा आँखों में, फिर दिखता और झलकता हूँ

तुम बूंद-बूंद सी बारिश में, जो टूट-टूट कर बरसे थे
फिर सहरा-सहरा बन कर क्यों, मैं बूंद-बूंद को तरसा हूँ

साकेत




ज़र्द - yellow, pale
आफ़ताब - sun
नूरानी - luminous

सहरा - desert

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