Thursday, October 18, 2012

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कागज़ की फसल

पहुँच गया सरकारी दफ़्तर ,
करने कागजी कार्यवाही।
चपरासी ने भी ना पूछा ,
यही है नौकरशाही।


खड़े खड़े इंतज़ार में सहसा ,
नज़र कहीं टकराई।
कैसे अलमारी भर भर 'बाबुओं' ने ,
है कागज़ की फसल उगाई।

अलमारी की दशा देखकर ,
मन आस बंध आई।
बिना धैर्य है नियति ने ,
किसे सफलता चखाई।

दूर चपरासी की आवाज़ सुन ,
मन में है ख़ुशी समाई।
आज मनो किस्मत भी हमपर ,
मंद मंद मुस्काई।


उठ दौड़ भाग बाबु के कमरे ,
हमने आसन जमाया।
'बिजी बाबु' के दर्शन हो गए ,
चरों धाम घूम आया।

स्थिरचित होकर सारे कागज़,
जब हमने बाबु को सौंपे।
कागज़ के कलपुर्ज़े निकाल कर ,
बाबु हमपर भौंके।

मन सिहर उठा, तन पर जैसे ,
बिजली कोई गिर आई।
एक सिरे से 'भगवन' ने जब ,
सैकड़ों गलतियाँ गिनवाई ||


गल्ती गिनवाने पश्चात 'भगवन' ,
'मानव' रूप में आए।
बोले, भक्त हूँ संविधान का ,
हैं 'गाँधी' मन में समाए।

मैं नादान 'प्रभुवाणी' का ,
तनिक बोध न कर पाया।
चपरासी की 'हिन्ट' पर कुछ-कुछ ,
माज़रा समझ में आया।

गाँधी-भक्ति में रमे हुए को मैंने ,
जब गाँधी-दर्शन करवाए।
तब जाकर कागज़ के मेरे ,
पाप कहीं धुल पाए।


(समझ गया)

कागज़ की इन फसलों के पीछे ,
गाँधी-प्रेम समाया है।

(शर्म आती है)

आज हमने भी ईमान बेचकर ,
इन फसलों को सिंचवाया है।


                        - साकेत


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