Saturday, July 27, 2013

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किसी दोस्त के नाम...

मेरे अरमाँ के चरागों से...रोशन वो राह करना
जिस राह पर चलने को अबके...फिर खड़ा हुआ है कोई

कि इबादतों के बक्से से...कुछ जुगनू से चुरा लेना
सजा देना वो मंजिल पाने जिसको...फिर खड़ा हुआ है कोई

कि तेरी राह रोशन है...तेरी मंजिल भी रोशन होगी
ख़्वाब किसी के जीने जो अबके...फिर खड़ा हुआ है कोई

के घबरा मत जाना गर फिर भी...जो अँधेरे मिलें तुझे राहों में
देखना सितारों को हाथ बिछा अपने...तेरे पीछे खड़ा होगा कोई


- साकेत

Sunday, July 21, 2013

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काश ! इक तार कर पाता...



कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
|
                   - बशीर बद्र 


कुछ वक्त बीत गया है...कितना वक्त इसका कोई हिसाब तो नहीं रख सका, पर हाँ कुछ साँसे जरूर कम हो गई हैं...एक-दो बाल और सफ़ेद हो चले होंगे शायद | मजबूरियाँ थीं...कुछ आदतों की...कुछ ज़रूरतों की | खैर, यही कोई एक-दो महीने की बेवफाई के बाद आ गया हूँ वापस....फिर से कुछ कहने कुछ सुनाने...

तो बात कुछ यूँ है कि पिछले कुछ महीनों में एक किस्सों का काफिला सा आकर गुज़र गया...कुछ मुसाफिर थे जो याद रह गए | दिन 15 जुलाई का था शायद, मैं अपनी आदतों और नींद दोनों से फिर एक बार वफ़ा निभा गया....और सुबह का सूरज जिसको शायद कभी मेरा इंतज़ार था भी नहीं, कब जवान हो गया पता भी नहीं चला | खैर, गुड आफ्टरनून के समय उठ कर मैंने अपने अज़ीज़ टूथ-ब्रश की ओर रुख किया ही था कि एक अजीब सी हलचल ने मेरे क़दमों का रुख मोड दिया | इतने कड़कते गुड आफ्टरनून में दर्ज़नों कदमों की ऐसी भीड़ सरीखी हरकत वाकई अजीब थी, नयी थी कुछ | कान लगा कर गौर से सुना तो मोहल्ले में कोई दो पैरों पे खड़ा सर कह रहा था कि कोई फलाना चचा (चाचा) गुजरने वाले हैं कुछ घंटों में | कानों के रिसीवर को थोड़ा और ट्यून किया तो पता लगा कि चचा अपने ज़माने के बहुत 'फेमस पर्सनालिटी' थे | आज तो टीवी पर भी छाए हुए हैं सुबह से | मैं भी सोच में पड़ा था कि कौन है यार वो 'फेमस पर्सनालिटी' अपने जान पहचान का ?? खैर, मैंने थोड़ा और 'फाइन ट्यून' किया | पता लगा कि चचा की अब उम्र हो चली थी | 163 साल के थे अपने चचा | कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे...आज गुज़र जाएँगे | उस दो पैरों पर एक सर वाले शख्स की आवाज़ धीमी होती गई और फिर भीड़ में कहीं गुम हो गई | मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था तो मैंने सीधे टीवी रिमोट पर हमला बोल दिया....सचमुच टीवी पर छाए हुए थे चचा...

हिंदी न्यूज़ वाले चचा का नाम 'तार' बता रहे थे और अंग्रेज़ी वाले 'TELEGRAM'
आज के लाडले मोबाइल और इंटरनेट ने चचा को हमसे कहीं दूर कर दिया था
...वरना कभी चचा ही थे जो दूर देस जाकर हर अच्छी-बुरी खबर दे आते थे |

मैंने भी सोचा कि चला जाए चलकर इक आखरी बार चचा का आशीर्वाद ले लिया जाए पर हर बार की तरह आदतों के चक्कर में वक्त निकल गया और चचा दूर चले गए...बहुत दूर |
अब क्या था कलम उठाने का एक बहाना मिल गया....सोचा था कि चचा के तेरहवें पर सुनाऊंगा उनके नाम लिखी श्रद्धांजलि लेकिन... 
फिर ख्याल आया अपना...अपनी आदतों का...कि फिर से कहीं देर ना हो जाए...

तो चचा तुम्हारे और सिर्फ तुम्हारे नाम......"काश ! इक तार कर पाता"



बैठा है 'कोई' कुछ उसके मैं..
नाम वक्त कर पाता |
कि फिर खड़ा होकर कतार में..
काश ! इक तार कर पाता |


कि उस पहले पहले प्यार का वो..
पहला इज़हार कर पाता |
और उसके शर्मीले इकरार का फिर..
ताउम्र इंतज़ार कर जाता |


काश ! इक तार कर पाता...

काश ! इक तार कर पाता उसको..
जो माँ बैठी है गाँव मेरे |
और बाबूजी की चप्पल को छूकर..
फिर नमस्कार कर आता |

काश ! इक तार कर पाता...

कोई बल्ला पकड़े खड़ा आज भी..
मोहल्ले मेरा यार है |
दोस्तों की भीड़ भाग 'जिगरी' को..
कुछ गेंदें ही डाल आता |

काश ! इक तार कर पाता...

कि वो 'कोई' कोई और नहीं..
मैं हूँ जो बैठा है, जो बैठा है कि..
कोई साकेत कभी खुद के..
कुछ नाम वक्त कर जाता |

कि कतार अलग खड़ा होकर..
कभी खुद को..
इक तार 'कोई' कर पाता |
इक आखिरी बार कर पाता |

काश ! इक तार कर पाता...  
 
- साकेत