Sunday, December 14, 2014

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दूरियाँ हमेशा रहीं

दूरियाँ हमेशा रहीं, नजदीकियों के ठिकाने ना रहे
साथ रहा कुछ यों के फ़साने....फ़साने न रहे |

मुद्दतों भटकने के बाद वो आज घर लौटा
माँ के हाथ की रोटी, लोरियों के ज़माने न रहे |

उम्र गुज़ार दी इक मुकम्मल मक़ाम की तलाश में
मक़ाम तो नसीब था,
वो यार पुराने न रहे |

शोर का बाज़ार है,
ये शोर का ज़माना
लता के गीत कहाँ, वो रफ़ी
के तराने न रहे |

माँ का आँचल ओढ़ बच्चे, आसमां से टकराते थे
आसमां टूट कर बरसा उनपे, जिनके सर शामियाने न रहे |

दीवाने लोग थे इश्क को इबादत समझते थे 
इश्क तो आज भी है, बस लोग दीवाने न रहे |



- साकेत



फ़साना - Tale, Fiction
मुकम्मल - Perfect, Complete
मक़ाम - Position
शामियाना - Canopy; A covering (usually of cloth) that
serves as a roof to shelter an area from the weather.


 

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