Friday, September 26, 2014

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ख्वाब था शायद !


आँचल का साया, चन्दन...
डांट मिश्री की गोली लगती है |
जब भी मेरी माँ हँसती है
मुझे जिंदगी होली लगती है |

अब किस 'अपने' से मिलें
इस गैर से शहर में,
यहाँ नुक्कड़-नुक्कड़
रिश्तों की बोली लगती है |

देने वाले ने देने को 
उसे पूरी कायनात दे दी,
उसे आज भी खाली
अपनी झोली लगती है |

कल अर्से बाद सड़कों पर
कोई बेतहाशा नाच रहा था,
किसी को कहते सुना "आवारा, मदमस्त,
'गँवारों' की टोली लगती है |"

वो बेपरवाह नाच रहा था, 
बेहिचक जी रहा था |
ख्वाब था शायद ! उसने अभी
नींद से आँखें खोली लगती हैं |



- साकेत

2 comments:

  1. कमाल का लिखा है यार...सही में।

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