Sunday, September 28, 2014

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ढूंढते रहे...

मंदिरों में ढूंढते रहे हम, उसे मस्जिदों में ढूंढते रहे
जो बहता था संग हवाओं के, उसे बंद कमरों में ढूंढते रहे |

जिंदगी मिला करती थी कभी मुझसे, मेरे गाँव की गलियों में
इक हम थे जो ताउम्र उसे, इन शहरों में ढूंढते रहे |

सौ बातें कर जाती थी वो, एक नज़र के झोंके से
जो बात हसीं थी 'उस'
चेहरे में, उसे हसीं चेहरों में ढूंढते रहे |

रेत बने घरोंदों को देख,
कोई हँसी कहीं खिल जाती थी
साहिल बैठी रोती रही 'वो',
जिसे हम लहरों में ढूंढते रहे |

इक छोटी सी चिड़िया भी थी, घर मेरे कभी आती थी
जो उम्र गुज़री, तो याद पड़ी, उसे हम शज़रों में ढूंढते रहे |

वो चाँद था 'किसी' रात का, सुबह तक मेरी खातिर रुकता था
भूल हुई, ज़रा-सी देर हुई हम,
उसे दोपहरों में ढूंढते रहे |



- साकेत 

4 comments:

  1. Awesome!
    I'm a huge fan of this blog. I never forget to share the writeups on twitter.
    This one left me speechless. Thank you. You made my day.

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    1. When I counted I got 29 words, when I pasted it to Microsoft Word it read 28 words...
      So be it..
      These 29 words from you mean a lot to me. Thank you for being associated with this blog. The feeling is mutual. This made my day. Stay Tuned!
      :)

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  2. A huge fan of your poetry . Motivating, refreshing , connecting.
    Great work , keep it up .
    Expecting more to come ��

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