Wednesday, September 25, 2013

Tagged under: ,

ख़यालात

कुछ टूटे-फूटे...भूले-बिसरे खयालात ...जो कभी-कभी मिलने आ जाया करते हैं...


मेरे पैकर के तंग रुखसारों पर...
छिपे गम कि पहनाई देख ले |
तन्हा रहता हूँ अब मैं...
कभी आकर मेरी तन्हाई देख ले ||


वो ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी होती...
गर वो देख हमें एक दफ़ा मुस्कुराते |
हम कैद कर लेते उनकी मुस्कराहट को आँखों में...
और कभी पलकें भी नहीं उठाते ||


हमें उन मुस्कुराहटों कि ख्वाहिश नहीं...
जो हर नज़र को तोहफा-ए-दीदार नज़र कर दें |
ख्वाहिशमंद तो उस मुस्कराहट के हैं जो...
हमारी ख्वाहिशों पर असर कर दे...


मुद्दतों बाद मिला हूँ तुझसे ख़्वाबों में...
मुद्दतों तेरे ख़्वाबों में खोया हूँ |
मुद्दतों बाद उठा हूँ सारे ख्वाब तोड़...
हर टूटे ख्वाब पर मुद्दतों रोया हूँ ||


आज आवारा बेपनाह इश्क को...
तल्ख़ तन्हाइयों का सहारा मिल गया |
टूट रोई थी दिल-ए-किश्ती पहले...
आज महबूब-ए-रुसवाइयों का किनारा मिल गया ||


महफ़िल सजी है आज...
महफ़िल में मेहमान बहुत हैं |
आप हों न हों इस महफ़िल में...
यहाँ आपके कदरदान बहुत हैं ||


कलम बोलती है,
कागज़ी रवाज बोलते हैं |
जब लिखा जाए शिद्दत से,
ये बेजुबान अल्फाज़ बोलते हैं ||


रोक हमें, कहीं तेरी ख़्वाबों का नूर न हो जाएँ...
नज़रें संभाल, कहीं तेरी आँखों का गुरूर न हो जाएँ |
दुआ करना, तो करना मेरे हश्र-ए-हालाक कि...
देख तेरी चाहत में हम, कहीं मशहूर न हो जाएँ ||

0 comments:

Post a Comment